चाय के बर्तन
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हमारे यहाँ चाय के बर्तन कभी घर नहीं जाते।करछी,कटोरी, कढ़ाई, पतीला, वक्त बेवक्त ही सही आखिर घर में दर्शन दे दिया करते हैं, पर चाय के बर्तनों के दर्शन उनके खन में दुर्लभ हैं। किचन के कबर्ड के दरवाज़े कई बार खुले और बंद हुए पर चाय के बर्तन के कदम घरकी दहलीज पर पहुँच ही नहीं पाते।उनका समय दिन में गैस पर चाय उबालते हुए और रात में बेसिन के गुनगुने पानी में भींगते ही बीतताहै।उनकी डबल शिफ्ट ऐसे ही चलती रहती है।सुबह होते ही बहुरानी के हाथों से जल्दी-जल्दी घिसाई चालू।जिससे बाबूजी और घर केअन्य सदस्यों के लिए चाय बन सके। फिर काफी वक्त चाय की गीली पत्तियों और दूध के उबली मलाई में रसे हुए ठंडी गैस पर सुबहगुजरती।
घर में दिन भर मेहमानों का आना-जाना लगा ही रहता है। कभी पड़ोस की आंटी तो कभी पास से वंदना भाभी आ जाती। घर में कोई भीआए,किसी समय भी आए, घर वाले एक ही बात की रट लगाए रहते, ''अरे! चाय तो पीकर जाइए। "
हर बार चाय के बर्तन उसी तरह फटाफट घिसे जाते, उनमें कप की मात्रा में पानी डाला जाता, फिर उबलते पानी में शक्कर घोली जाती, छोटी चम्मच से चाय की पत्ती डाली जाती, फिर दूध मलाई बचा कर ध्यान से डाला जाता और छान्ने के बाद मेहमानो को पेश की जाती।
चाय के बरतन फिर सुलगती गैस के ऊपर अपने अगले अंजाम का इंतेज़ार करते। जब दोपहर मे बाईं आती, तब आख़िरकार उनकोइत्मीनान से नहलाया जाता।तीन से पाँच बजे जब पूरा घर भरे पेट और भरे मन से ज़ोर से घूमते पंखे के नीचे चैन की नींद लेते, तब चायके बर्तन अपने साथियों के साथ किचन के टोवेल पर सूखते सूखते मन हलका करते।
चाय के बर्तन, चमचमाती स्टील की प्लेट, कटोरी और चमचों की तरफ देख के कहते,"अरे!तुम लोगों की ही जिन्दगी अच्छी है यार।दिन में दो-तीन बार काम, फिर आराम ही आराम। भाई !और क्यों ना हो, तुम लोग की संख्या इतनी है कि हर दूसरे दिन छुट्टी भी मिलजाती है। यही नहीं ,अगर संडे की शाम घर वालों का घर के खाने से मन ऊब जाए, तो वीकेंड की छुट्टी। यह हुई ना लाइफ !"
इस पर कढ़ाई ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा,"सही कहा भाई।असली काम तो हम ही करते हैं।हम न हो तो इस किचन में एक पत्ता भी नहिले।प्लेट, चमचे, कटोरी, तो आज की इजाद हैं, हम तो बरसों से इस किचन को सम्भाल रहे हैं। जिसने कभी गैस पर पाँव न रखे हों, वो क्या जाने अंगारों पे चलना किसे कहते हैं।"
चम्मच ने खिसियाते हुए कढ़ाई से कहा, "अरे काम ज्यादा है तो इज्जत भी तो ज्यादा मिलती है। तुम्हारे नाम पर बड़े- बड़े शेफ अपनेपकवानों के नाम रखते हैं- कढ़ाई पनीर, कढ़ाई चिकन वगैरा वगैरा । पर हमारी क्या औकात है, जरा बाहर जाकर देखो , हर मुँह पेगाली बनकर रह गए हैं- साला चमचा, बाॅस का चमचा, बस इस तरह बोला जाता है, बताओ! और तो और घर में भी कोई इज्जत नहीहै। उस दिन बगल के घर में पिताजी ने अपने बेटे को मुझे ही फेंक कर मार दिया। अरे चमचा होना कोई बुरी बात है क्या। खाने को प्लेटसे मुँह तक पहुंचाने का काम कौन करता है।अरे, हम करते है हम। क्या समझे! बर्तन समाज के पायलट है हम।
गांव से आई खानदानी पुरानी बड़ी कढ़ाई चिल्लाई- "अरे बंद करो ये बकर बकर । तुम सब निकम्मे हो। अरे गैस पर खाना पकाने भीकोई पकाना है।हम तो सालों तक कोयले की आग में सुलगते रहे हैं।माताजी के फेफड़े जरूर जल गए, पर मजाल हो कभी खाना जलाहो।इन चाय के बर्तनों के बारे में तो मैंने पहले दिन ही कह दिया था-पूत के पैर पालने में ही दिख जाते हैं।जब घर वाले इस को उस मरेसुपर मार्केट से डिस्काउंट के लालच में उठाकर लाए थे , तब ही से मुझे इनके लक्षण ठीक नहीं लग रहे थे।कमबख्त ने एक दिन भीघर में नही गुजारा। बस चाय पे चाय बन रही है।"
चाकू जो काफी देर से यह सब सुन रहा था, उसने कुछ कहने के लिए हिम्मत जुटाई और अपना मुंह खोला-"हमारा काम भी खतरे से भरा हुआ है।" बस फिर क्या था ,सब के सब एक साथ उस पर बरस पड़े-"हट साले कसाई की औलाद। मुँह मत खोलना अपना। पूरेबर्तन समाज का नाम मिट्टी में मिला दिया है तूने।हम यहाँ लोगों का पेट भरें और तू दिन भर काट-कटाई में लगा रहता है,और तो औरबीबीजी की उँगली भी काट दी तूने पिछले हफ्ते।"
इन ही नोंक झोंक और आपसी मन मुटाव में घड़ी की सुई न जाने कब पांच बजे की तरफ बढ़ गई और बहुरानी ने शाम की चाय काकार्यक्रम शुरू कर दिया।दिन- सप्ताह,सप्ताह-महीना और महीना साल में बदल गए ,पर चाय के बर्तनों की ज़िन्दगी वही बेसिन मेंभीगने के लिए उतरने और गैस पर चढ़ने के उतार-चढ़ाव में ही चलती रही।
आखिरकार एक दिन ऐसा भी आया ,जब दूर गांव में बुआ की लड़की, निक्की की शादी की खबर घर में आई। निक्की सब की बहुतचेहती थी,इसलिए उसकी शादी की खबर सुनकर घर में खुशी की लहर दौड़ गई। घर में मिठाई, कचौड़ी, समोसा और भी न जाने क्या-क्या खाने के पदार्थ बनाए और मंगाए गए। यही नही, इन पकवानों के साथ-साथ चाय कैसे पीछे रह जाती तो उसके दौर भी चलते रहे।बनाओ और पीओ।
फिर एक दिन वो भी आया जब सालों बाद घर के दरवाज़े पर ताला लगा और घर वाले निक्की की शादी के लिए रवाना हुए। किचन केकबर्ड सब बर्तनों से भर गए। बड़ी कढ़ाई के अंदर बड़ा पतीला, जिसके अंदर छोटा पतीला और फिर उसमें सबसे छोटा चाय का पतीलारखा गया। चाय की छन्नी अपने साथियों के साथ दराज़ में रखी गई।
इस तरह, कुछ दिनों के लिए ही सही,सालों बाद चाय के बर्तनों की अपने घर में वापसी हुई।
धन्यवाद शोभा Aunty को, जिन्होंने मुझे यह आर्टिकल एडिट करने मे मदत की।उनके लिखे लेख आप यहाँ पढ़ सकते है।